चरण विधि

चरणविधि


चरणविधि

शुद्धात्मा प्रति प्रार्थना
हे अन्तर्यामी दादा भगवान वीतराग परमात्मा!
हे अन्तर्यामी श्री सीमंधर स्वामी अरिहंत परमात्मा!
हे अन्तर्यामी श्री शिव कल्याणस्वरुप निर्वेद वीतराग परमात्मा।।
आप हरएक जीवमात्र में विराजमान हैं।
वैसे ही मुझमें भी प्रकट स्वरुप से विराजमान है।
आपका वीतराग परमात्मा-स्वरूप जो "द्रव्य-गुण-अवस्था" से है, 
“निर्वेद" है,वही मेरा प्रकट स्वरुप है।
मेरा प्रकट स्वरुप “द्रव्य-गुण अवस्था” से “शुद्धात्मा" है।
हे शुद्धात्मा भगवान!मैं, आज्ञाधारक आपको 
अभेदभाव से अत्यंत भक्तिपूर्वक नमस्कार करता हूँ।
प्रमादवश, अजागृति के कारण,
मुझसे आज्ञाभंग संबंधी जो-जो दोष हुए हैं एवं हो रहे हैं,
उन सब दोषों को आपके समक्ष जाहिर करता हूँ,
उनके लिए हृदयपूर्वक बहुत पश्चात्ताप करता हूँ
और आपके पास क्षमा-प्रार्थना करता हूँ।
हे प्रभु! मुझे क्षमा कीजिए, क्षमा कीजिए, क्षमा कीजिए,
और फिर कभी ऐसे दोष मुझ से न हो ऐसी परम शक्ति प्रदान करें।
हे शुद्धात्मा भगवान!आप ऐसी कृपा करें 
मेरे, हमारे, अपने, सबके"भेदभाव" छूट जाए
और "अभेदस्वरुप" प्राप्त हो जाए।
  मैं,आपमें अभेदस्वरुप से तन्मयाकार रहे


1.हे दादा भगवान । मुझे किसी भी देहधारी जीवात्मा के अहम को तनिक भी ठेस न पहुँचे, न मै ऐसा करने की किसी के प्रेरणा या न मैं ऐसा करनेवाले का अनुमोदन कर, ऐसी मुझे परम शक्ति दो l

मुझसे किसी भी देहधारी जीवात्मा के अहम् को, तनिक भी ठेस न पहुँचे ऐसी स्यादवाद वाणी, स्यादवाद व्यवहार और स्यादवाद मनन करने की, मुझे परम शक्ति दो ।

२.हे दादा भगवान ,मुझसे किसी भी धर्म के प्रमाण पर तनिक भीआघात न हो, न ऐसा करने की मैं किसी को प्रेरणा दूँ और न ऐसा करनेवाले का में अनुमोदन करू, ऐसी मुझे परम शक्ति दो 

३. हे दादा भगवान ! मुझे किसी भी देहधारी उपदेशक या आचार्य का अवर्णवाद, अपराध, विनय, न करने परम शक्ति दो l

४. हे दादा भगवान ! मुझे किसी भी देहधारी जीवात्मा के परि तनिक भी अभाव, उपेक्षा कभी भी न हो, न मैं ऐसा करने की किसी को प्रेरणा दूं और न ही अनुमोदन करूँ, ऐसी मुझे परम शक्ति दो।

5.है दादा भगवान । मैं किसी भी देहधारी जीवात्मा के साथ कभी भी कठोर भाषा में, तिक्त भाषा में न बोलूँ, न किसीको बोलने की प्रेरणा दूं या उसका अनुमोदन कर ऐसी मुझे परम शक्ति दो। कोई मुझसे कठोर, तिक्त भाषा में बोले तो मुझे मृदु ऋजु भाषा में बोलने की शक्ति दी।

६. हे दादा भगवान मुझे किसी भी देहधारी जीवात्मा के प्रति स्त्री, पुरुष या नपुंसक-कोई भी लिंगधारी हो, उनके संबंध में तनिक भी विषय-विकार संबंधी दोष, इच्छाएँ, चेष्टाएँ, विचार संबंधी दोष न हो, न किसीसे करवाऊँ, न कर्ता को अनुमोदित कि, ऐसी मुझे परम शक्ति दो । मुझे निरंतर निर्विकार रहने की परम शक्ति दो।

७. हे दादा भगवान ! मैं किसी भी रस में लुब्ध न बनूँ ऐसी शक्ति दो, समरस आहार लिया जाए, ऐसी परम शक्ति दो।

८. हे दादा भगवान | मुझसे किसी भी देहधारी जीवात्मा का, प्रत्यक्ष या परोक्ष, जीवंत अगर मृत्यु प्राप्त, किसी से तनिक भी अवर्णवाद, अपराध, अविनय न हो, न करवाऊँ या कर्ता के प्रति न अनुमोदन करूं, ऐसी मुझे परम शक्ति दो.

 ९. है दादा भगवान । मुझे जगत कल्याण करने का नियमित बनने की परम शक्ति दो, शक्ति दो, शक्ति दो

🖕इतना आपको "दादा" के पास माँगना है :
यह चीज प्रतिदिन पढ़ने की नहीं है, दिल में रखने की चीज़ है। यह प्रतिदिन उपयोग पूर्वक पालन करने की चीज है । इतने पाठ में तमाम शास्त्रों का सार आ जाता है।
(प्रतिदिन सुबह, दोपहर, शाम, तीन बार ऐसी भावना करनी है)
----------------


निश्चय नियमन 
👉ज्ञान संपन्न महात्माओं के लिए निश्चय नियमन

हे “दादा भगवान"! आज के दिन मैं दृढ़ निश्चय” करताहूँ कि “आपने जो दिव्यचक्षु” दिए हैं, उससे मैं “रिलेटिव”("व्यवहार") तथा “रियल" ("निश्चय") दृष्टि से ही हर चीज़ देख सकूँ, ऐसी शक्ति दो, शक्ति दो, शक्ति दो।
हे “दादा भगवान" उदयकर्म आज फल देने के लिए तैयार हआ है, यह प्रमाण रूप में "व्यवस्थित शक्ति" संयोग एकत्र करेगा, लेकिन मेरे पिछले अज्ञान की चिकनाहट के कारण,ऐसे संयोगों में “मेरापन" और "अपनापन" का भाव जगाएगा,ऐसा मानने के लिए प्रेरित करेगा, परंतु 'आज्ञाधीन' भाव से मेरा यह दृढ़निर्णय “निश्चय" है कि "शुद्धात्मा स्वभाव" से मैं किसी भी क्रिया का कर्ता नहीं हूँ, मैं “अकर्ता" ही हूँ और "व्यवस्थित शक्ति ही कर्ता है", 'व्यवस्थित शक्ति' में, मैं रुकावट न बनूं, ऐसी हे " दादा भगवान " , हे " शुद्धात्मा भगवान " ! मुझे शक्ति दो , शक्ति दो , शक्ति दो । 
संयोगों को वीतराग दृष्टि से देखने की शक्ति दो ! शक्ति दो ! शक्ति दो ! 
अब तो एक ही लक्ष्य है कि जो भी Accounts feed 
( जमा खाता ) हुए होंगे , वो हिसाब से , हर दिन का , सभी Accounts ( लेखा ) का , “ फ़ाइलों का समभाव से निपटारा " करना है । “ दादा " , ऐसी शक्ति आपदो । 
अब तो " शुद्धात्मा का खाता " ( Account ) ही , मेरा खाता है । आपने जो “ दिव्यचक्षु " दिए हैं , उससे ही " देखने समझने " की शक्ति दो , शक्ति दो , शक्ति दो और “ देखने समझने " का चूक मिल जाए तो Shoot - on - sight ( उसी वक्त ) प्रतिक्रमण करने की शक्ति दो , शक्ति दो , शक्ति दो । अगर मुझसे प्रमादवश , अजागृति के कारण " देखने समझने " का रह जाए तो यथार्थ आलोचना , प्रतिक्रमण एवं प्रत्याख्यान करने की शक्ति दो , शक्ति दो , शक्ति दो । 
" मेरा स्वरूप द्रव्य , गुण , अवस्था से शुद्ध है " , इसे मैं अनुभव में अपना सकूँ , ऐसी शक्ति दो , शक्ति दो , शक्ति दो । 
 मेरी हर सांस “ दादा भगवान " के लिये “ आज्ञाधर्म " से ही उपयोग हो , ऐसी शक्ति दो , शक्ति दो , शक्तिदो । हमारा “आज्ञाधर्म - भक्ति " , मन , वचन एव काया की एकता के दृढ़निर्णय “ निश्चय " से चरम सीमा की पूर्णता को प्राप्त हो , ऐसी शक्ति दो , शक्ति दो , शक्ति दो ! 

* प्रत्यक्ष "दादा भगवान" की साक्षी में, वर्तमान में
महाविदेह क्षेत्र में विचरते हुए, तीर्थंकर भगवान "श्री सीमंधर स्वामी "
को अत्यंत भक्तिपूर्वक नमस्कार करता हूँ ।......... ...(४०)
* प्रत्यक्ष "दादा भगवान'' की साक्षी में, वर्तमान में महाविदेह क्षेत्र
में तथा अन्य क्षेत्रों में विचरते हुए "ॐ परमेष्ठि भगवंतो" को
अत्यंत भक्तिपूर्वक नमस्कार करता हूँ ।...........
★ प्रत्यक्ष "दादा भगवान'' की साक्षी में, वर्तमान में महाविदेह क्षेत्र में
तथा अन्य क्षेत्रों में विचरते हुए "पंचपरमेष्ठि भगवंतो" को 
अत्यंत भक्तिपूर्वक नमस्कार करता हूँ ........(5)

* प्रत्यक्ष "दादा भगवान" की साक्षी में वर्तमान में महाविदेह क्षेत्र में
तथा अन्य क्षेत्रों में विचरते हुए "तीर्थंकर साहबों" को अत्यंत भक्तिपूर्वक नमस्कार करता हूँ .......
★ "वीतराग शासन देव-देवियों को अत्यंत भक्तिपूर्वक नमस्कार करता हूँ.
★ "निष्पक्षपाती शासन देव-देवियों को अत्यंत भक्तिपूर्वक नमस्कार करता हूँ। ..........
* "चौबीस तीर्थंकर भगवंतो" को अत्यंत भक्तिपूर्वक नमस्कार करता हूँ......
★ "श्रीकृष्ण भगवान'' को अत्यंत भक्तिपूर्वक नमस्कार करता हूँ ।.......

भरतक्षेत्र में, वर्तमान में विचरते हुए सर्वज्ञ "श्री दादा भगवान को
अतः समस्त जगत को "भगवत स्वरूप में दर्शन करता है......(५)
में निश्चय-निर्णय से, अभेदभाव से,
अत्यंत भक्तिपूर्वक नमस्कार करता हूँ ........
"दादा भगवान' के भावी तीर्थंकर साहबों को
अत्यंत भक्तिपूर्वक नमस्कार करता हूँ ........

* "दादा भगवान'' के सभी कल्याणमूर्ति
समकितधारी "ज्ञानी महात्माओं को
अत्यंत भक्तिपूर्वक नमस्कार करता हूँ ...
है सकल ब्रह्मांड के जीव मात्र के 'रियल स्वरूप' को
अत्यंत भक्तिपूर्वक नमस्कार करता हूँ ।...
* 'रियल स्वरूप' ही भगवत स्वरूप है,
* 'रियल स्वरूप' ही 'शुध्धात्म स्वरूप' है,
अतः समस्त जगत को 'शुध्धात्म स्वरूप' में दर्शन करता हूँ ।
'रियल स्वरूप' ही 'तत्त्व स्वरूप' है,
अतः समस्त जगत का तत्त्वज्ञान स्वरूप में दर्शन करता हूँ....
वर्तमान तीर्थंकर श्री सीमंधर स्वामी को परम पूज्य
श्री "दादा भगवान" द्वारा प्रत्यक्ष नमस्कार पहुंचते हैं।
(प्रतिदिन एक बार कोष्ठक में दी गई संख्या में बोलना है।
'वीतराग विज्ञान के बिना और न कोई उपाय'

ॐ ह्रीं दादा भगवान 'सर्वज्ञ' शरणं गच्छामि |
'दादा भगवान का असीम जय जयकार हो ।


      चरण विधि

ज्ञान-साक्षात्कार प्राप्त महात्माओं के लिए निश्चय-व्यवहार-चरणविधि
(प्रतिदिन एक बार अवश्य पढ़ें)

दादा भगवान को.
त्रिकाल नमस्कार, नमस्कार, नमस्कार ।
हे नीरागी, निर्विकारी, सच्चिदानंद स्वरूप,सहजानंदी, अनंत ज्ञानी,  अनंत दर्शी, त्रैलोक्यप्रकाशक, शुध्ध, बुध्ध, चैतन्यघन स्वरूप,परम ज्योति सुखधाम ऐसे हे वीतरागी परमात्मा !मैं निश्चय निर्णय से केवल शुध्धात्मा हूँ (३) मुझे आपकी अपूर्व शक्ति दीजिए। (५) मुझे शुध्धात्मा का सतत स्मरण दीजिए।आपका अखंड निदिध्यासन दीजिए।आपका अखंड सान्निध्य दीजिए।आपके सर्वोत्कृष्ट सदगुण मुझमें उत्कृष्टरूप से स्फुरायमान हों। (३)
हे विश्ववंद्य ऐसे प्रकट शुध्धात्मा स्वरूप प्रभु !आप इस युग के संदर्भ में दूसरे राम या महावीर ही हैं।आपही मेरे प्रकट शुध्धात्मा हो।आपमें जैसी आत्मा प्रवर्तमान है,वैसी ही आत्मा मुझमें प्रवर्तमान हो । मेरा मन और बुध्धि सर्वथा आपके वश होकर व्यवहार करते रहें ।समस्त विश्व की विस्मृति और केवल एक आप ही की स्मृति मुझेप्राप्त हो ।भाव से केवल शुध्धात्मानुभव के अलावा इस जगत की कोई भी विनाशी चीज मुझे नहीं चाहिए ।मैं प्रतिक्षण सदैव सर्वथा स्वसत्ता में रहकर स्वसत्ता का ही उपभोग करूँ,वैसे ही परसत्ता में कभी भी प्रवेश न करूँ, ऐसा मुझे दृढ़ निर्णय निश्चय प्रदान करें ।हे विश्ववंद्य ऐसे प्रकट शुध्धात्मा स्वरूप प्रभु !मेरे सर्व प्रकार के सभी दोषों की मुझे क्षमा करें। (३)दया दीजिए, शांति दीजिए, समता दीजिए,सत्य दीजिए, त्याग दीजिए,वैराग्य दीजिए।

संसार-भूमिका अदा करने के आरंभ काल से आज दिन की अद्यक्षण पर्यंत इस जगत के जीवों की तनिक भी शंका-कुशंका की, करवाई या करने का अनुमोदन किया हो; कुछ भी अपराध किये, करवाये या करने का अनुमोदन किया हो;कुछ भी विराधना की हो,करवाई हो या करने का अनुमोदन किया हो; कुछ भी बाधाएँ की हो ,करवाई हो या करने का अनुमोदन किया हो; छ: महाव्रतों का भंग करके अठारह पाप स्थानकों द्वारा कुछ भी अविनय, अविवेक, अभक्ति, अपकार्य या दोष जाने अनजाने किये हों, करवायें हों या करनेवाले की अनुमोदन किया हो तो उन सभी दोषों की क्षमा माँगता आलोचना,प्रतिक्रमण, प्रत्याख्यान करता हूं । मुझे क्षमा करें । (३)

हे विश्ववंद्य ऐसे प्रकट शुध्धात्मा स्वरूप प्रभु !आप नीरागी, निर्विकारी, सच्चिदानंद स्वरूप,सहजानंदी, अनंत ज्ञानी, अनंद दर्शी,त्रैलोक्य प्रकाशक हैं । मैं भावकर्म, नोकर्म, द्रव्यकर्म, मन-वचन-काया* …….
(नामी तथा नामी के )  नाम की सर्व माया आप प्रकट परमात्मा स्वरूप प्रभु के सुचरणों में समर्पण करता हूँ। (३) 

मैं चैतन्यघन स्वरूपी ऐसा शुध्धात्मा हूँ । (३) मैं अरूपी हूँ। (३) मैं असंग हूँ। (३) मैं अक्षय हूँ। (३) मैं अमूर्त हूँ। (३)
मैं अच्युत हूँ। (३) मैं अजन्म हूँ। (३) मैं अमर हूँ। (३) मैं जन्म-मरण से मुक्त ऐसा शुध्धात्मा हूँ।(३) मैं अव्याबाध-स्वरूप हूँ। (३) मैं परमानंद सुख स्वरूपवाला हूँ। (३)मैं टंकोत्कीर्णवत् ऐसा शुध्धात्मा हूँ। (३)मैं स्व-पर प्रकाशक शुध्धात्मा हूँ। (३) मैं 'दादा भगवान' जैसा 
शुध्धात्मा हूँ। (३) मैं ऋषभदेव दादा भगवान' जैसा शुध्धात्मा हूँ। (३) मैं 'महावीर भगवान' जैसा शुध्धात्मा हूँ। (३)मैं सीमंधर स्वामी भगवान' जैसा शुध्धात्मा हूँ। (३)मैं 'श्री कृष्ण भगवान' जैसा शुध्धात्मा हूँ। (३)मैं ज्ञातपुत्र हूँ और आप मेरे ज्ञात पिता हैं। (३) मैं परम ज्योतिस्वरूप सिध्ध भगवान हूँ। (३) मैं अनंत ज्ञानवाला हूँ। (३)मैं अनंत दर्शनवाला हूँ। (३)मैं अनंत शक्तिवाला हूँ। (३)मैं अनंत सुख का धाम हूँ। (३) मैं अगुरु-लघु स्वभाववाला हूँ। क्रोध, मान, माया लोभ ये लघु-गुरु स्वभाव के ही हैं। (३) द्रव्य से मैं संपूर्ण शुध्ध हूँ, सर्वांग शुध्ध हूँ। (३) ज्ञान-दर्शनादि अनंत गुणों से मैं संपूर्ण शुध्ध हूँ, सर्वांग शुध्ध हूँ। (३)अनंत ज्ञेयों को जानने में परिणमित अनंत अवस्थाओं में ,मैं संपूर्ण शुध्ध हूँ, सर्वांग शुध्ध हूँ। (३) मैं अविनाशी हूँ। (३) मैं अव्यय हूँ। (३) मैं सूक्ष्म हूँ। (३)
मैं केवल निर्विकल्प वीतराग ज्ञान ही हूँ। (३)मैं निर्मल अखूट परमानंद स्वरूपी हूँ। (३) 
मैं सर्व परद्रव्योंसे सर्वथा उदासीन ही हूँ। (३)

सूर्य समान तेजस्वी एवं चंद्र समान शीतल ऐसे हे वीतराग परमात्मा !तमाम लेपायमान भावों से मैं सर्वथा निर्लेप ऐसा शुध्धात्मा हूँ। (३) मन, वचन, काया की तमाम संगी क्रियाओं से मैं नितांत असंग ही हूँ। (३)
मन, वचन, काया की आदतें और उनके स्वभाव को मैं जानता और मेरे स्व-भाव को भी मैं जानता हूँ। (३)
मन, वचन, काया से नितांत भिन्न ऐसा मैं शुध्धात्मा हूँ। (३) स्थूलतम से सूक्ष्मतम तक तमाम संसारी अवस्थाओं का मैं केवल ज्ञाता-दृष्टा हूँ,टंकोत्कीर्ण हूँ, आनंदस्वरूप हूँ। (३) आहारी आहार करता है,और में निराहारी सिर्फ उसे जानता हूँ। (३) अवस्था मात्र कुदरती रचना है,जिसका रचनेवाला किसी का बाप भी नहीं
और वह 'व्यवस्थित' है। (३) मन, वचन काया की आप जैसी सहजता मुझे प्राप्त हो। (३)आपकी वृत्ति वही मेरी वृत्ति हो। (३)आपकी दृष्टि वही मेरी दृष्टि हो। (३) आपका स्वभाव वही मेरा स्वभाव हो। (३)आपका ज्ञान, दर्शन, चारित्र्य और सुख वही मेरा ज्ञान, दर्शन, चारित्र्य और सुख हो। (३) 

है विश्ववंद्य ऐसे प्रकट शुध्धात्मा स्वरूप प्रभु !मुझे और सर्व कल्याणमूर्ति समकितधारी महात्माओं को तीव्र ज्ञान दशा प्राप्त हो,संपूर्ण अर्पणता प्राप्त हो, संपूर्ण अभेदता प्राप्त हो, संपूण वीतरागता प्राप्त हो, प्रबल पुरुषार्थ प्राप्त हो। सभी कल्याणमूर्ति समकितधारी महात्माओं के शुध्धात्मा को अत्यंत भक्ति से अभेदभाव से बारंबार त्रिकाल नमस्कार, नमस्कार, नमस्कार करके इतना ही माँगता हूँ, कि समताभाव से मैंने जो दृढ़ निर्णय निश्चय किया है,कि मुझे शुध्धात्मानुभव प्राप्त हो; और वह प्राप्त होने में सर्व कल्याणमूर्ति समकितधारी महात्माओं के सर्वोत्कृष्ट सद्गुण मुझमें उत्कृष्ट रूप से प्रस्फुटित होकर मुझे शक्तिमान बनाएँ। (३) समस्त विश्व का कल्याण करें,और कल्याण करने का निमित्त बनने की मुझे परम शक्ति दो।समस्त विश्व के जीवों को सुख और शांति प्राप्त हो।समस्त विश्व के जीवों को मोक्ष प्राप्त हो। 

हे विश्ववंद्य ऐसे प्रकट शुध्धात्मा स्वरूप प्रभु मैं कभी भी आप गुरुदेव से,
ज्ञानवाद से, स्यादवाद से,परमज्ञान से, परम ध्यान से शुध्धात्मा से, शुध्धात्मा की उपासना करनेवाले सर्व कल्याणमूर्ति समक्तिधारी महात्माओं के शुध्धात्मा से,सर्व सिध्धों से, संतों से, महंतों से,जगत के प्रत्येक जीव से कभी भी शंकित, वंचित या अनदेखा न होऊँ वैसी शक्ति, भक्ति, दृष्टि, ज्ञान, विवेक, विनय, चारित्र्य और प्रज्ञा प्रदान करें । एकनिष्ठ होकर केवल एक आपकी आज्ञा में ही रहने की मेरी जो दृढ़ अभिलाषा है और प्रतिज्ञा है ,उसे पूरी करने की शक्तियाँ मुझे प्राप्त हो। (३)  आज दिन की अद्य क्षण पर्यंत आपकी जिन आज्ञाओं का पालन मुझसे नहीं हो पाया,उन सभी के लिए मैं क्षमा चाहता हूँ; आलोचना, प्रतिक्रमण, प्रत्याख्यान करता हूँ, मुझे क्षमा करें, क्षमा करें, क्षमा करें।

हे विश्ववंद्य ऐसे प्रकट शुध्धात्मा स्वरूप प्रभु !आप व्दारा उद्बोधित सत्संग मुझमें निरंतर हो। (३)आप दारा उद्बोधित सम्यक् ज्ञान मुझे हर क्षण जागृति प्रदान करे। (३)स्थूल संयोग, सूक्ष्म संयोग, वाणी के संयोग पर हैं और पराधीन हैं,यह ज्ञान मेरे हृदय में संस्थापित रहे। (३) मैं कहीं दखल-विक्षेप न करूं ऐसी मुझे शक्ति दें। (३)केवल देखभाल करने की मुझे शक्ति दें। (३)मैं केवल एक आपकी ही कृपा का अभिलाषी हूँ। (३)
आपके चरणारविंद ,मेरे हृदय में संस्थापित हो। (३) मैं शुध्धात्मा हूँ, मैं शुध्धात्मा हूँ,(२५) मैं निश्चय निर्णय से केवल शुध्दात्मा ही हूँ। (२)

मैं विज्ञान स्वरूप हूं(3)

जय सच्चिदानंद


प्रतिक्रमण-विधि

प्रत्यक्ष दादा भगवान की साक्षी में
देहधारी* के मन, वचन, काया के योग;
भावकर्म, द्रव्यकर्म, नोकर्म से भिन्न ऐसे
हे प्रकट शुध्धात्मा भगवान !
आज दिन तक जो जो** दोष हुए हैं
उसकी क्षमा माँगता हूँ,
प्रश्चाताप करता हूँ।
आलोचना, प्रतिक्रमण, प्रत्याख्यान करता हूँ
और पुन: ऐसे दोष कभी भी न करूँ,
ऐसा दृढ़ निश्चय करता
हे दादा भगवान !
मुझे ऐसा कोई भी दोष न करने की
परम शक्ति दो शक्ति दो, शक्ति दो.
-जय सच्चिदानंद
संबंधित व्यक्ति का नाम लेना।
"जो दोष दुए हों ते मन में जाहिर करना।

मुझे क्षमा करो, क्षमा करो,क्षमा करो

     
जगत भर के सत्पुरुष का योग बल।
जगत भर के संत पुरुषों का योग बल ।
और प्रकट ज्ञानी पुरुष का योग बल।
जगत के समस्त जीवो का कल्याण करो,
कल्याण करो, कल्याण करो।
और जगत कल्याण करने में निमित बनने
की मुझे परम शक्ति दो, शक्ति दो,शक्ति दो।
जगत के सभी जीवो को सुख और शांति
प्राप्त हो।
दुनिया के सभी जीवो को मोक्ष प्राप्त हो।
जगत कल्याण हो, कल्याण हो,
 कल्याण हो।


         Varse Aho Mahavir na

Varas Aho 'Mahavir'na
Varas aho 'Mahavir' na, (2)
shurveerta relavjo; (2)
Kayar bano na koi di, (2) kashto
sada kampavjo. (2)
Re ! sinhna santanne, (2) shiyal shukarnar chhe ? (2)
Marnant sankat ma take, (2) te teknadharnar chhe. (2)
Kaya tani darkar shu? (2) jo shatruvat samjay to; (2)
Kulvant kulvat na taje, (2) shu sinha tarna khay jo ! (2)
Sarvagnani samjan grahe, (2) te maran ne shane gane ? (2)
Kshatriy jo virhaak sune, (2) to chade zat te rane. (2)
Nij amar aatmane smarine, (2) amarta varta ghana; (2)
E mokshgami satpurushna, charanama ho vandana. (2)
Sangram aa shurvirno, (2) avyo apurva dipavjo; (2)
Karta n paachhi pani tya, (2) Dada ne padkhe bhavjo. (2)
Samta, sahanshilta, kshama, (2)
dhiraj, samadhi maranama; (2)
Mitro saman sahay karshe, (2) man dharo Dada charanma. (2)
Keval asang dasha varo, (2)
pratibandh sarve taljo; (2)
Swachhand chhodi suddha bhave, (2)
sarvama prabhu bhaljo. (2)
Dushman pramad hani have, (2) jagrat raho, jagrat raho; (2)
'Dada'ne sharne hraday rakhi, (2)
abhay mukti ma raho. (2)
Jai sachchidanand.


                
सर्त देवलोकनो राजीपो"ज्ञानी" पर, 
तेथी ज 'महात्माओं" फरी शके नीडर,
कोई पण 'महात्मा ने 'उपसर्ग आवे त्यारे.
कोई पण 'महात्मा ने 'परिषह' आवे त्यारे,
 'दादाजी' धरे छे बेउ हाथु  
मोकले छे लश्कर आखुं l
मोक्षदान' સાથે ,अभय दान' खास्सुं, हृदय-कमळमां 'दादा' ज स्थापू , 
 'मूर्तामूर्त-मोक्ष'नी ज्ञान-भक्ति प्रार्थु, 'मूर्तामूर्त-मोक्ष'नी तंदुरस्ती प्रार्थु, 
आ सिद्ध-मंदिर तंदुरस्ती प्रार्थु, 
'दादा', 'दादा' बोलतां न थाकुं.

 




पच आज्ञा... 
(१) 'रिलेटिव व्यूपॉइन्ट' से 'मैं चंदुलाल हूँ'।
 (२) 'रियल व्यू पॉइंट' से 'मैं शुद्ध आत्मा हूँ'। 
(३) जगत नियंता-व्यवस्थित शक्ति है
 (४) फाइलों का समभाव से निपटारा करना 
(७) शुध्धात्मा की बही खाते में रकम जमा करना
 'पैकिंग न देखते हुए उसके शुद्ध आत्मा को दिव्य दृष्टि से देखना।  












Popular posts from this blog